130 वां संविधान संशोधन विधेयक, 2025
अनुच्छेद 75 में 5क जोड़ा जाएगा---
75( 5क) में प्रावधान और तीन परंतुक हैं। इसका प्रभाव इस प्रकार है--
यदि किसी केन्द्रीय सरकार के मंत्री को गिरफ्तार किया गया है [ इसमें प्रधान मंत्री शामिल है]
उसपर किसी ऐसे अपराध का आरोप है जिसमें पाँच साल तक या ज्यादा की सजा हो सकती है।
गिरफ़्तारी के तीस दिन हो गए हैं।
31 वें दिन उस मंत्री को पद से हटा दिया जाएगा।
पद से हटाने का काम प्रधान मंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति करेंगे।
यदि मंत्री को हटाया नहीं जाता तो 32 वें दिन अपने आप मंत्री पद से मुक्त हो जाएगा।
प्रधान मंत्री के मामले में [अर्थात यदि प्रधानमंत्री को ऐसे अपराध मे गिरफ्तार किया गया है जिसमें 5 साल तक या ज्यादा की सजा हो सकती है, और उसे गिरफ्तार हुए 30 दिन हो गए हैं, तो उसे 31 वें दिन स्वयं ही इस्तीफा देना होगा। यदि प्रधान मंत्री इस्तीफा नहीं देता तो 32 वें दिन उसे स्वतः ही पद से मुक्त समझ लिया जाएगा। ]
इसी प्रकार अनुच्छेद 164(4क) जोड़ा जाएगा जिसमें इसी प्रकार के प्रावधान राज्य के मंत्री के बारे में है।
यदि किसी राज्य सरकार के मंत्री को गिरफ्तार किया गया है [ इसमें मुख्य मंत्री शामिल है]
उसपर किसी ऐसे अपराध का आरोप है जिसमें पाँच साल तक या ज्यादा की सजा हो सकती है।
गिरफ़्तारी के तीस दिन हो गए हैं।
31 वें दिन मंत्री को पद से हटा दिया जाएगा।
पद से हटाने का काम मुख्य मंत्री की सलाह पर राज्यपाल करेंगे।
यदि मंत्री को हटाया नहीं जाता तो 32 वें दिन अपने आप मंत्री पद से मुक्त हो जाएगा।
मुख्य मंत्री के मामले में [अर्थात यदि मुख्य मंत्री को ऐसे अपराध मे गिरफ्तार किया गया है जिसमें 5 साल तक या ज्यादा की सजा हो सकती है, और उसे गिरफ्तार हुए 30 दिन हो गए हैं, तो उसे 31 वें दिन स्वयं ही इस्तीफा देना होगा। यदि मुख्य मंत्री इस्तीफा नहीं देता तो 32 वें दिन उसे स्वतः ही पद से मुक्त समझ लिया जाएगा। ]
ये मंत्री जिन्हे गिरफ़्तारी के कारण पद छोड़ना पड़ा है, जेल से निकलने के बाद फिर से मंत्री बन सकते हैं।
ऐसा ही परिवर्तन केंद्र शासित प्रदेश के लिए भी किया गए है।
This 130th Constitutional Amendment Bill is a path towards furthering cleaner politics in India. There is a history of criminalisation of politics in India not only affecting the governance of our country but also tainting the constitutional post and principles. Given the recent case wherein a chief minister of National Capital was reluctant to resign from his office post arrest, thereby causing administrative difficulties and governance issues, as it becomes difficult to administer from jail. The bill thus seeks to remove an unscrupulous legislator from office who taints the constitutional post and post arrest is causing hindrance in governance. The bill has provided for time period of 30 days, only post which the minister is removed from office. This window of 30 days is crucial as during this period the minister has right to seek bail. Thus, the bill has also incorporated a mechanism of judicial oversight in cases of frivolous arrests. However there are few pertinent questions too which needs to be addressed: 1.) Whether removal from post on mere arrest undermines the fundamental principle of presumption of innocence? 2.) Whether it can be a potential tool for misuse by removal of leaders through arrests in opposition ruled states? 3.) Although the right to bail exists, but what about arrests in serious offences like UAPA wherein bail conditions are stringent?
ReplyDeleteयह 130वां संवैधानिक संशोधन विधेयक भारत में स्वच्छ राजनीति को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। भारत में राजनीति का आपराधिकरण एक पुराना मुद्दा रहा है, जिसने न केवल हमारे देश की शासन व्यवस्था को प्रभावित किया है, बल्कि संवैधानिक पदों और सिद्धांतों को भी कलंकित किया है। हाल ही में एक मामला सामने आया जिसमें राष्ट्रीय राजधानी के मुख्यमंत्री ने गिरफ्तारी के बाद अपने पद से इस्तीफा देने से इनकार कर दिया, जिससे प्रशासनिक अड़चनें और शासन में कठिनाइयाँ उत्पन्न हुईं, क्योंकि जेल से शासन चलाना व्यावहारिक रूप से मुश्किल हो जाता है।
ReplyDeleteयह विधेयक ऐसे किसी भी विधायक को पद से हटाने का प्रयास करता है जो गिरफ्तारी के बाद संवैधानिक पद की गरिमा को ठेस पहुँचाता है और शासन में बाधा उत्पन्न करता है। विधेयक में 30 दिनों की एक समयावधि निर्धारित की गई है, जिसके बाद ही मंत्री को पद से हटाया जाएगा। यह 30 दिनों की अवधि महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दौरान मंत्री को जमानत लेने का अधिकार प्राप्त होता है। इस प्रकार, विधेयक ने मनमानी गिरफ्तारी के मामलों में न्यायिक निगरानी की व्यवस्था भी की है।
हालांकि, इससे कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न भी उत्पन्न होते हैं जिन पर विचार करना आवश्यक है:
क्या केवल गिरफ्तारी के आधार पर पद से हटाना "निर्दोष मानने की मूलभूत अवधारणा" को कमजोर करता है?
क्या यह विधेयक विपक्ष-शासित राज्यों में नेताओं को गिरफ्तार कर उनके पद से हटाने के लिए दुरुपयोग का उपकरण बन सकता है?
भले ही जमानत का अधिकार हो, परंतु जब किसी गंभीर अपराध जैसे यूएपीए (UAPA) के तहत गिरफ्तारी हो, जहाँ जमानत की शर्तें कठोर होती हैं, तो उस स्थिति में क्या होगा?